Monday, 13 July 2020

अनोखी दुनिया

अपनों ने ही अपना ना कहा,

गैरों का साया भी छूट गया,

जिन रास्तों पे चले थे साथ के लिए,

उन रास्तों ने भी गवारा कर दिया।



जब जब भी ये बाजू. बढ़े,

कांटों से ही रूबरू हुआ,

हर बार जब दिल्लगी भी की,

तोह कतल ए आम का तोहफा मिला।



दिल में दिल्लगी की हिम्मत नहीं,

और ना बाजुओं में प्यार है,

इस अनोखे से जहां में,

बस अपना ही अब साथ है।



ना किसी से प्यार है, और ना कोई तकरार है,

बस अपनी ही दरकार है, बस अपनी ही दरकार है,

अब इन लबों और सांसों में, एक ही दुआ बेकरार है,

ऐ रब तेरा इंतज़ार है, बस तेरा ही अब इंतजार है।

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