महल ही कैद खाना लग गया,
पर उन मजलूमों का सोचा नहीं,
जिन्हे आसमान का छत नसीब हुआ।
जिन आरामो में हमारी ज़िंदगी है पली,
जिन आरामो में हमारी ज़िंदगी है पली,
उन आरामों में इनकी चीखें हैं,
जिन अशर्फियों से हैं हमरी खुशियों की पैमाईशें,
उन अशर्फियों की पैमाईशें इनके लहू से है
इस जहां के आराम ओ शौक, इसी जहां में रह जाएंगे,
इस जहां के आराम ओ शौक, इसी जहां में रह जाएंगे,
पर इस जहां के हिसाब अगले जहां में लिए जाएंगे,
जब इस्तेफार होगा हमसे हमारे कुर्रा ए अर्ज़ के हयात पे,
फिर जन्नत ए दरवाज़े पे मजलूम भी ना बन पाएंगे,
इन जन्नतों की कीमतों को जहनम में जाके चुकाएंगे।
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