Sunday, 9 August 2020

जशन ए राम

आज सुना था जशन ए राम है,
आगमन ओ तख्त ए ताज है,
दीवाली सी एक रात है,
आज सुना था जशन ए राम है।

जो राम कह गए हमें,
उसका ना कोई आगाज़ है,
अब राम के ही नाम पे,
हर कु- कर्म की बुनियाद है।

कलयुग के इस संसार में,
मर्यादा के आभाव में,
हम राम को हैं मानते,
पर इंसान को दुत्कारते।

है एक सवाल इस जहां से,
इस जहां के इंसानों से,
जो राम को हैं पूजते,
वह अल्लाह को कैसे दुषते।

हैं राम मेरे मन में भी,
हैं अल्लाह मेरे मन में भी,
मैं राम को भी पूजता,
और इबादत ए क़ुरान में भी झूमता।

इंसान की इंसानियत में,
ही इबादत है बसी,
जो इंसान को ही ना पूछता,
उसकी इबादत क्या भली।

No comments:

Post a Comment

Men! - The World is Not Your Oyster!

A recent chat with a friend about her social media post got me thinking about something uncomfortable but necessary: the way men often reduc...