आज सुना था जशन ए राम है,
आगमन ओ तख्त ए ताज है,
दीवाली सी एक रात है,
आज सुना था जशन ए राम है।
जो राम कह गए हमें,
उसका ना कोई आगाज़ है,
अब राम के ही नाम पे,
हर कु- कर्म की बुनियाद है।
कलयुग के इस संसार में,
मर्यादा के आभाव में,
हम राम को हैं मानते,
पर इंसान को दुत्कारते।
है एक सवाल इस जहां से,
इस जहां के इंसानों से,
जो राम को हैं पूजते,
वह अल्लाह को कैसे दुषते।
हैं राम मेरे मन में भी,
हैं अल्लाह मेरे मन में भी,
मैं राम को भी पूजता,
और इबादत ए क़ुरान में भी झूमता।
इंसान की इंसानियत में,
ही इबादत है बसी,
जो इंसान को ही ना पूछता,
उसकी इबादत क्या भली।
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