अपनों को छोड़, गैरों के संग चले,
ख़ुदग़र्ज़ थे या थे दबे हुए,
सिर्फ एक ख्वाब लेके चले,
अपनों से दूर, उनके सपनों के लिए,
शहरों में जाकर रुक गए,
सपनों की राह को संवारने,
पर शहरों की इन महलों के बीच,
झोपड़ों में सिमट के रह गए,
इन झोपड़ों में, बिखरते सपनों के बीच,
गैरों में प्यार पनपता था,
अपनों से दूर रहकर भी, अपनापन जैसा लगता था,
दुख भरी व्यथा की खेतों में,
सबका साथ हमेशा रहता था,
ना ललाट पे सुखों की रेखा थी,
ना था संकट से छुटकारा,
झोपड़ों की तो बुनियाद ना थी,
महलों से सहारे की थी अभिलाषा,
फिर घोर संकट आन पड़ा,
प्रकृति ने सीना तान लिया,
झोपड़ों की तब बुनियाद हिली,
पर मिला ना उसको सहारा,
झोपड़ों को बिखरने में देर ना लगी,
सपनो की कांच तब फूट गई,
जो भाग्य से लड़ कर जीते थे,
इंसानों के सामने उनकी एक ना चली,
अब कोई झोपड़ा बचा नहीं,
अभी महलों को ये पता नहीं,
तख्त ओ ताज तो अब भी हैं वहां,
पर ना दिखती कहीं भी बंदगी,
जो आस लेकर आए थे,
वह बददुआएैं देके जा रहे,
अब रोकना मुमकिन नहीं,
क्यूंकि सपनों को ये दफना चले।
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